Monday, February 8, 2010





ज़िन्दगी का प्रथम प्रेरणा दायक पुरुस्कार: Sunshine Blog Award

Monday, January 25, 2010

बिसात

रोज़ मर्रा की मामूलन आवाज़ों में


शाम कि नमाज़ यूँ ही घुल जाती है


रूहानियत का जायका चाय काफी में आता है


फिर भी हलक में इबादत अटकने लग जाती है


रोज़ भूल जाते है हम है भी के नहीं


काश इक दिन आके कह दे वो


हां तुम हो, मेरी ही बिसात के प्यादे


दांव लगा है, आखिर तक खेलना है


एक जान, एक नया तमाशा आने तक


तुम होगे बुनियाद उसकी


चौसठ ओ बिसात मेरी ही कहलाएगी

तमन्ना

तमन्ना मचल रही है फिर
चाहिए थोड़ी सी ज़मीं, थोड़ी सी मिटटी,
बनाना है इक आंगन, इक झूला,
इक छत्त , इक चूल्हा

गुज़र के जाने को हो , हवा उस घर से,
शाख-पत्तों को हिलाकर
धुप में सूखते दुप्पटे को बुलाकर
आने को है कोई , गुड लेकर
इक भूला

आँगन

आसमां है कितना बड़ा, किसी को पता ही नहीं
छोटा सा है मेरे घर का आंगन, पर ये ढकता ही नहीं

कुछ खट्टी-मीठी सी आरजूं , खिलती है, किलकारियां मारती है
चुलबुली धूप कि, पैर रखने कि जगह देती ही नहीं

बादल ही काश दे रिमझिम बूंदे, आँगन ढका जायेगा मेरा
फिर कोई आरजू, कोई शिकायत नहीं

Tuesday, January 12, 2010

रास्ता

गए थे जहाँ मेले में मिलने के लिए
रह गए खुद ही गुम हो कर
आवाज़ देते रहे उन आरजुओं को


जिनका रास्ता ही पता न था

Thursday, September 17, 2009

अरज

क्या याद है तुम्हे
पहाडो से आते आते चाय पीने के बहाने
मेरी उड़ती लट को कान के पीछे किया था
धीमे से कुछ कहा था
मैं तुम्हारा हूँ
आजीवन रहूँगा

आज फिर तमन्ना मचली है
लट फिर उड़ निकली है
पहाड़ तो नही, खुला आसमा है
तुम मेरे साथ हो
चाय की दूकान भी यही नुक्कड़ पे खुली है

अरज करती हूँ पिया
जब भी राह तकूँ तुम्हारी
भरी भरी पलकें हो
आना उसपे तुम ज़रूर
गोद में सर रखके मेरी
लटो को सुलझाना ज़रूर

भागवत

एक शास्त्री भागवत को हाथों में लेके
यू चूम रहा था अधरों से
आँखों से भी लगाया उसने
मनो हर अक्षर समझ में आया हो उसकी

समय बीता प्रतीक्षा में
आश्चर्य चकित हो सोचती रही




आज शास्त्री की विधवा का चेहरा देखकर
उसके हाथों को चूमकर
आँखों के चमकते तारों से
समझ में आया है हर अक्षर
भागवत का मुझे